संसार में सबसे बड़ा पुण्य क्या है, इसे कैसे किया जाता है प्राप्त ?

संसार में जितने भी कर्म होते है अपितु किए जाते है उनका फल कहीं न कहीं किसी न किसी रुप में अवश्य प्राप्त होता है। इसे देना स्वंय ईश्वर के हाथों में होता है। जिसका आधार होता है, मनुष्य के सकारात्मक कर्म। लेकिन यह तो बात हुई कर्म के फल की। इसलिए इंसान को ये भी जानना जरुरी है कि ऐसा कौनसा पुण्य है।

जिसे कौनसे कर्म से प्राप्त किया जा सकता है,लेकिन इस विषय के बारे में जानने से पहले मनुष्य को ये भी नही भुलना चाहिए कि सबसे बड़े पुण्य को प्राप्त करने के लिए एक ही कर्म में लग जाएं। कर्मों के फल स्वरुप मिला पुण्य सभी मनुष्य वर्ग ही नही बल्कि समाज औप इस सम्पूर्ण सृष्टि के हित में होता है। तो चलिए जानते है कौनसे है वो पुण्य।

सबसे पहले कर्म की उत्पति होती है धर्म से। जब मनुष्यों को अपनें धर्मों का ज्ञान होता है तो उसे स्वयं ही अपने कर्मो की पहचान होती है कि वह क्या कर रहा है? और उसे कौनसा सतमार्ग अपनाना चाहिए। फिर आता है धर्म जिसका अर्थ होता है धारण करना अर्थात जिसे धारण किया जा सके। धर्म और कर्म दोनों ही प्रधान होते है।

जो कि व्यक्ति के गुणों को प्रदर्शित करता है। धर्म सार्वभौमिक है इस बात को निश्चित रुप से स्वीकारें। अच्छे कर्म, जिसको करके पुण्य की प्राप्ति करना। अब बात करते है पुण्य के बारे में। पुण्यों को प्राप्त करने से पहले सतकर्मों का होना अतिआवश्यक है जिसके मुताबिक मनुस्मृति में श्लोक दिया गया जिसका हर एक शब्द इन सतकर्मों को करना सिखाता है । यह इस प्रकार है।

धृति : क्षमा दनोस्यतेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह : । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।
अर्थात धृति यानि की मनुष्य को हर परिस्थिति में धैर्य बरतना चाहिए।

क्षमा – यानी की इन्सान को बदलने की भावना को त्याग करना चाहिए और क्रोध का कारण होने पर भी क्रोध नही करना चाहिए।

दम – मनुष्य को उंदण्ड़ नही होना चाहिए।

अस्तेय – दुसरे की वस्तु को हथियाने का त्याग छोड़ देना चाहिए, और ना ही कभी विचार मन में लाना चाहिए।

शौच – आहार की शुद्धता यानी की हम जो खा रहे है वह खाद्य वस्तु शुद्ध होनी चाहिए, और साथ ही शरीर को शुद्ध रखना चाहिए।

इंद्रियनिग्रह–अपनी इंद्रियों को वश में रखना चाहिए अर्थात कोई कामवश या लोभ मोह से लिप्त विचारों का त्याग करना चाहिए।

धी –किसी बात को भलीभांति समझना चाहिए या प्रयास करना चाहिए।

विद्या – धर्म , अर्थ , काम और मौक्ष का भलीभांति ज्ञान अवश्य होना चाहिए।

सत्य – मनुष्य को हमेशा सही शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए झूठे वचनों से बचना चाहिए, जो बातें मनुष्य के हित में ना हो उन्हे ना तो बोलना चाहिए और ना ही किसी और को करने कि सहमति देनी चाहिए। आखरी शब्द है अक्रोध-यानी क्षमा के बाद भी कोई अपमान करें तो भी क्रोध नही करना चाहिए। यह ऐसे सतकर्म है जिन्हे मनुष्य को जरुर पढ़ने और ध्यान करना चाहिए। कर्म के बाद बात आती है दान की।

मनुष्य के सत्कर्मो में दान का सबसे बड़ा महत्व है। निर्भर करता है दान करने की क्षमता पर जैसा मनुष्य दान करेगा उसे वैसा ही प्राप्त होगा। ऐसे पुण्यों को प्राप्त करने में सबसे बड़ा पुण्यों में परोपकार को सबसे बड़ा पुण्य बताया गया है। यानी की मनुष्य को पुण्यों को प्राप्त करनें के लिए अपने व्यवहार में सत्कर्मों के साथ परोपकार की भावना को जरुर महत्व देना चाहियें जिसमें निस्वार्थ भाव का होना आवश्यक है।

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